श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.63

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥ ६३

ahaṃ bhaktaparādhīno hyasvatantra iva dvija|

sādhubhirgrastahṛdayo bhaktairbhaktajanapriyaḥ|| 63

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ। मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे सीधे-सादे सरल भक्तोंने मेरे हृदयको अपने हाथमें कर रखा है। भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे॥ ६३॥

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