श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.62

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अजानता ते परमानुभावं

कृतं मयाघं भवतः प्रियाणाम्।

विधेहि तस्यापचितिं विधात-

र्मुच्येत यन्‍नाम्‍न्युदिते नारकोऽपि॥ ६२

ajānatā te paramānubhāvaṃ

kṛtaṃ mayāghaṃ bhavataḥ priyāṇām|

vidhehi tasyāpacitiṃ vidhāta-

rmucyeta yannāmnyudite nārako'pi|| 62

अर्थ

आपका परम प्रभाव न जाननेके कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्तका अपराध किया है। प्रभो! आप मुझे उससे बचाइये। आपके तो नामका ही उच्चारण करनेसे नारकी जीव भी मुक्त हो जाता है’॥ ६२॥

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