श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.61

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

संदह्यमानोऽजितशस्त्रवह्निना

तत्पादमूले पतितः सवेपथुः।

आहाच्युतानन्त सदीप्सित प्रभो

कृतागसं माव१ हि विश्‍वभावन॥ ६१

saṃdahyamāno'jitaśastravahninā

tatpādamūle patitaḥ savepathuḥ|

āhācyutānanta sadīpsita prabho

kṛtāgasaṃ māva hi viśvabhāvana|| 61

अर्थ

दुर्वासाजी भगवान्‌के चक्रकी आगसे जल रहे थे। वे काँपते हुए भगवान्‌के चरणोंमें गिर पड़े। उन्होंने कहा—‘हे अच्युत! हे अनन्त! आप संतोंके एकमात्र वाञ्छनीय हैं। प्रभो! विश्‍वके जीवनदाता! मैं अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ६१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    मामव विश्‍व।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 26)

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