स मुक्तोऽस्त्राग्नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमांस्ततः।
प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः॥ १३
sa mukto'strāgnitāpena durvāsāḥ svastimāṃstataḥ|
praśaśaṃsa tamurvīśaṃ yuñjānaḥ paramāśiṣaḥ|| 13
अर्थ
जब दुर्वासा चक्रकी आगसे मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १३॥
स मुक्तोऽस्त्राग्नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमांस्ततः।
प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः॥ १३
जब दुर्वासा चक्रकी आगसे मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.5.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 29) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/5/13/