श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.14

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

दुर्वासा उवाच

अहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे।

कृतागसोऽपि यद् राजन् मंगलानि समीहसे॥ १४

aho anantadāsānāṃ mahattvaṃ dṛṣṭamadya me|

kṛtāgaso'pi yad rājan maṃgalāni samīhase|| 14

अर्थ

दुर्वासाजीने कहा—धन्य है! आज मैंने भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका महत्त्व देखा। राजन्! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मंगल-कामना ही कर रहे हैं॥ १४॥

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