श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.20

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै।

दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥ २०

prīto'smyanugṛhīto'smi tava bhāgavatasya vai|

darśanasparśanālāpairātithyenātmamedhasā || 20

अर्थ

अम्बरीष! आप भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त हैं। आपके दर्शन, स्पर्श, बातचीत और मनको भगवान्‌की ओर प्रवृत्त करनेवाले आतिथ्यसे मैं अत्यन्त प्रसन्‍न और अनुगृहीत हुआ हूँ॥ २०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें