श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.24

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

गते१ च दुर्वाससि सोऽम्बरीषो

द्विजोपयोगा२तिपवित्रमाहरत् ।

ऋषेर्विमोक्षं व्यसनं च बुद‍्ध्वा

मेने स्ववीर्यं च परानुभावम्३॥ २४

gate ca durvāsasi so'mbarīṣo

dvijopayogātipavitramāharat |

ṛṣervimokṣaṃ vyasanaṃ ca buddhvā

mene svavīryaṃ ca parānubhāvam|| 24

अर्थ

जब दुर्वासाजी चले गये, तब उनके भोजनसे बचे हुए अत्यन्त पवित्र अन्‍नका उन्होंने भोजन किया। अपने कारण दुर्वासाजीका दुःखमें पड़ना और फिर अपनी ही प्रार्थनासे उनका छूटना—इन दोनों बातोंको उन्होंने अपने द्वारा होनेपर भी भगवान्‌की ही महिमा समझा॥ २४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    गतेऽथ।

    (मुद्रित पृष्ठ 31)
  2. २

    गाभिपवि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 31)
  3. ३

    महानुभावम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 31)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें