श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.6

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नमः सुनाभाखिलधर्मसेतवे

ह्यधर्मशीलासुरधूमकेतवे ।

त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे।

मनोजवायाद्भुतकर्मणे गृणे॥ ६

namaḥ sunābhākhiladharmasetave

hyadharmaśīlāsuradhūmaketave |

trailokyagopāya viśuddhavarcase|

manojavāyādbhutakarmaṇe gṛṇe|| 6

अर्थ

सुनाभ! आप समस्त धर्मोंकी मर्यादाके रक्षक हैं। अधर्मका आचरण करनेवाले असुरोंको भस्म करनेके लिये आप साक्षात् अग्‍नि हैं। आप ही तीनों लोकोंके रक्षक एवं विशुद्ध तेजोमय हैं। आपकी गति मनके वेगके समान है और आपके कर्म अद्भुत हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आपकी स्तुति करता हूँ॥ ६॥

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