श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.7

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहृतं

तमः प्रकाशश्‍च धृतो महात्मनाम्।

दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पते

त्वद्रूपमेतत् सदसत् परावरम्॥ ७

tvattejasā dharmamayena saṃhṛtaṃ

tamaḥ prakāśaśca dhṛto mahātmanām|

duratyayaste mahimā girāṃ pate

tvadrūpametat sadasat parāvaram|| 7

अर्थ

वेदवाणीके अधीश्‍वर! आपके धर्ममय तेजसे अन्धकारका नाश होता है और सूर्य आदि महापुरुषोंके प्रकाशकी रक्षा होती है। आपकी महिमाका पार पाना अत्यन्त कठिन है। ऊँचे-नीचे और छोटे-बड़ेके भेदभावसे युक्त यह समस्त कार्य-कारणात्मक संसार आपका ही स्वरूप है॥ ७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें