इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन, मान्धाता और सौभरि ऋषिकी कथा
श्रीशुक उवाच
विरूपः केतुमाञ्छम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः।
विरूपात् पृषदश्वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः॥ १
virūpaḥ ketumāñchambhurambarīṣasutāstrayaḥ|
virūpāt pṛṣadaśvo'bhūt tatputrastu rathītaraḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अम्बरीषके तीन पुत्र थे—विरूप, केतुमान् और शम्भु। विरूपसे पृषदश्व और उसका पुत्र रथीतर हुआ॥ १॥
विरूपः केतुमाञ्छम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः।
विरूपात् पृषदश्वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अम्बरीषके तीन पुत्र थे—विरूप, केतुमान् और शम्भु। विरूपसे पृषदश्व और उसका पुत्र रथीतर हुआ॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 31) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/6/1/