अन्तमें जब उन्हें यह मालूम हुआ कि भगवान्की प्रेरणासे राजा युवनाश्वने ही उस जलको पी लिया है तो उन लोगोंने भगवान्के चरणोंमें नमस्कार किया और कहा—‘धन्य है! भगवान्का बल ही वास्तवमें बल है’॥ २९॥✎ 1636
राज्ञा पीतं विदित्वाथ ईश्वरप्रहितेन ते।
ईश्वराय नमश्चक्रुरहो दैवबलं बलम्॥ २९
अन्तमें जब उन्हें यह मालूम हुआ कि भगवान्की प्रेरणासे राजा युवनाश्वने ही उस जलको पी लिया है तो उन लोगोंने भगवान्के चरणोंमें नमस्कार किया और कहा—‘धन्य है! भगवान्का बल ही वास्तवमें बल है’॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 34) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/6/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)