श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घ्राणतः सुतः।

तस्य पुत्रशतज्येष्ठा विकुक्षिनिमिदण्डकाः॥ ४

kṣuvatastu manorjajñe ikṣvākurghrāṇataḥ sutaḥ|

tasya putraśatajyeṣṭhā vikukṣinimidaṇḍakāḥ|| 4

अर्थ

परीक्षित्! एक बार मनुजीके छींकनेपर उनकी नासिकासे इक्ष्वाकु नामका पुत्र उत्पन्‍न हुआ। इक्ष्वाकुके सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े तीन थे—विकुक्षि, निमि और दण्डक॥ ४॥

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