दस दिन बीतनेपर वरुणने आकर फिर कहा—‘अब मेरा यज्ञ करो।’ हरिश्चन्द्रने कहा—‘जब आपके यज्ञपशुके मुँहमें दाँत निकल आयेंगे, तब वह यज्ञके योग्य होगा’॥ ११॥✎ 16372046
निर्दशे च स आगत्य यजस्वेत्याह सोऽब्रवीत्।
दन्ताः पशोर्यज्जायेरन्नथ मेध्यो भवेदिति॥ ११
दस दिन बीतनेपर वरुणने आकर फिर कहा—‘अब मेरा यज्ञ करो।’ हरिश्चन्द्रने कहा—‘जब आपके यज्ञपशुके मुँहमें दाँत निकल आयेंगे, तब वह यज्ञके योग्य होगा’॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.7.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 39) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/7/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)