श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

पितरं वरुणग्रस्तं श्रुत्वा जातमहोदरम्।

रोहितो ग्राममेयाय तमिन्द्रः प्रत्यषेधत॥ १७

pitaraṃ varuṇagrastaṃ śrutvā jātamahodaram|

rohito grāmameyāya tamindraḥ pratyaṣedhata|| 17

अर्थ

कुछ दिनके बाद उसे मालूम हुआ कि वरुणदेवताने रुष्ट होकर मेरे पिताजीपर आक्रमण किया है—जिसके कारण वे महोदर रोगसे पीड़ित हो रहे हैं, तब रोहित अपने नगरकी ओर चल पड़ा। परन्तु इन्द्रने आकर उसे रोक दिया॥ १७॥✎ 1637 2046

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1637 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विश्‍वा-मित्र → विश्‍वामित्र
  • #2046 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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