श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.18

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

भूमेः पर्यटनं पुण्यं तीर्थक्षेत्रनिषेवणैः।

रोहितायादिशच्छक्रः सोऽप्यरण्येऽवसत् समाम्॥ १८

bhūmeḥ paryaṭanaṃ puṇyaṃ tīrthakṣetraniṣevaṇaiḥ|

rohitāyādiśacchakraḥ so'pyaraṇye'vasat samām|| 18

अर्थ

उन्होंने कहा—‘बेटा रोहित! यज्ञपशु बनकर मरनेकी अपेक्षा तो पवित्र तीर्थ और क्षेत्रोंका सेवन करते हुए पृथ्वीमें विचरना ही अच्छा है।’ इन्द्रकी बात मानकर वह एक वर्षतक और वनमें ही रहा॥ १८॥✎ 1637 2046

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1637 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विश्‍वा-मित्र → विश्‍वामित्र
  • #2046 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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