श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.14

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यस्येरिता सांख्यमयी दृढेह नौ-

र्यया मुमुक्षुस्तरते दुरत्ययम्।

भवार्णवं मृत्युपथं विपश्‍चितः

परात्मभूतस्य कथं पृथङ्मतिः॥ १४

yasyeritā sāṃkhyamayī dṛḍheha nau-

ryayā mumukṣustarate duratyayam|

bhavārṇavaṃ mṛtyupathaṃ vipaścitaḥ

parātmabhūtasya kathaṃ pṛthaṅmatiḥ|| 14

अर्थ

यह संसार-सागर एक मृत्युमय पथ है। इसके पार जाना अत्यन्त कठिन है। परन्तु कपिलमुनिने इस जगत‍्में सांख्यशास्त्रकी एक ऐसी दृढ़ नाव बना दी है जिससे मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला कोई भी व्यक्ति उस समुद्रके पार जा सकता है। वे केवल परम ज्ञानी ही नहीं, स्वयं परमात्मा हैं। उनमें भला, यह शत्रु है और यह मित्र—इस प्रकारकी भेदबुद्धि कैसे हो सकती है?॥ १४॥

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