श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.6

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नावधीद् गुरुवाक्येन चक्रे विकृतवेषिणः।

मुण्डाञ्छ्मश्रुधरान् कांश्‍चिन्मुक्तकेशार्धमुण्डितान्॥ ६

nāvadhīd guruvākyena cakre vikṛtaveṣiṇaḥ|

muṇḍāñchmaśrudharān kāṃścinmuktakeśārdhamuṇḍitān|| 6

अर्थ

सगर चक्रवर्ती सम्राट् थे। उन्हींके पुत्रोंने पृथ्वी खोदकर समुद्र बना दिया था। सगरने अपने गुरुदेव और्वकी आज्ञा मानकर तालजंघ, यवन, शक, हैहय और बर्बर जातिके लोगोंका वध नहीं किया, बल्कि उन्हें विरूप बना दिया। उनमेंसे कुछके सिर मुड़वा दिये, कुछके मूँछ-दाढ़ी रखवा दी, कुछको खुले बालोंवाला बना दिया तो कुछको आधा मुँडवा दिया॥ ५-६॥

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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