॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.8.7
अनन्तर्वाससः कांश्चिदबहिर्वाससोऽपरान्।
सोऽश्वमेधैरयजत सर्ववेदसुरात्मकम्॥ ७
anantarvāsasaḥ kāṃścidabahirvāsaso'parān|
so'śvamedhairayajata sarvavedasurātmakam|| 7
अर्थ
कुछ लोगोंको सगरने केवल वस्त्र ओढ़नेकी ही आज्ञा दी, पहननेकी नहीं। और कुछको केवल लँगोटी पहननेको ही कहा, ओढ़नेको नहीं। इसके बाद राजा सगरने और्व ऋषिके उपदेशानुसार अश्वमेध यज्ञके द्वारा सम्पूर्ण वेद एवं देवतामय, आत्मस्वरूप, सर्वशक्तिमान् भगवान्की आराधना की। उसके यज्ञमें जो घोड़ा छोड़ा गया था, उसे इन्द्रने चुरा लिया॥ ७-८॥