श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.2

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं

द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।

पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-

स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥ २

yaṃ pravrajantamanupetamapetakṛtyaṃ

dvaipāyano virahakātara ājuhāva|

putreti tanmayatayā taravo'bhinedu-

staṃ sarvabhūtahṛdayaṃ munimānato'smi|| 2

अर्थ

जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था तथा लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, तभी उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके लिये घरसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे—‘बेटा! बेटा! तुम कहाँ जा रहे हो?’ उस समय वृक्षोंने तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे उत्तर दिया था। ऐसे सर्वभूत-हृदयस्वरूप श्रीशुकदेवमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २॥ ✎ 1266

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1266 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीशुक-देवमुनिको → श्रीशुकदेवमुनिको

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