॥ श्रीहरिः ॥
लोकविग्रहमुक्तस्य नारदस्यास्थिरस्य च।
विधिश्रवे कुतः प्रीतिः संयोगः कुत्र तैः सह॥ २३
lokavigrahamuktasya nāradasyāsthirasya ca|
vidhiśrave kutaḥ prītiḥ saṃyogaḥ kutra taiḥ saha|| 23
अर्थ
शौनकजीने पूछा—सांसारिक प्रपंचसे मुक्त एवं विचरणशील नारदजीका सनकादिके साथ संयोग कहाँ हुआ और विधि-विधानके श्रवणमें उनकी प्रीति कैसे हुई?॥ २३॥
लोकविग्रहमुक्तस्य नारदस्यास्थिरस्य च।
विधिश्रवे कुतः प्रीतिः संयोगः कुत्र तैः सह॥ २३
शौनकजीने पूछा—सांसारिक प्रपंचसे मुक्त एवं विचरणशील नारदजीका सनकादिके साथ संयोग कहाँ हुआ और विधि-विधानके श्रवणमें उनकी प्रीति कैसे हुई?॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 35) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/23/