श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.35

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

नारद उवाच

अनयाऽऽकाशवाण्यापि गोप्यत्वेन निरूपितम्।

किं वा तत्साधनं कार्यं येन कार्यं भवेत्तयोः॥ ३५

anayā''kāśavāṇyāpi gopyatvena nirūpitam|

kiṃ vā tatsādhanaṃ kāryaṃ yena kāryaṃ bhavettayoḥ|| 35

अर्थ

नारदजी बोले—इस आकाशवाणीने भी गुप्त-रूपमें ही बात कही है। यह नहीं बताया कि वह कौन-सा साधन किया जाय जिससे इनका कार्य सिद्ध हो॥ ३५॥✎ 1563

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1563 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आकाश-वाणीने → आकाशवाणीने

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