श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.68

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

आमूलाग्रं रसस्तिष्ठन्‍नास्ते न स्वाद्यते यथा।

स भूयः संपृथग्भूतः फले विश्‍वमनोहरः॥ ६८

āmūlāgraṃ rasastiṣṭhannāste na svādyate yathā|

sa bhūyaḥ saṃpṛthagbhūtaḥ phale viśvamanoharaḥ|| 68

अर्थ

जिस प्रकार रस वृक्षकी जड़से लेकर शाखाग्रपर्यन्त रहता है, किंतु इस स्थितिमें उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता; वही जब अलग होकर फलके रूपमें आ जाता है, तब संसारमें सभीको प्रिय लगने लगता है॥ ६८॥✎ 1565

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1565 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्रीमद्भागवत-पुराण → श्रीमद्भागवतपुराण

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