sa bhūyaḥ saṃpṛthagbhūtaḥ phale viśvamanoharaḥ|| 68
अर्थ
जिस प्रकार रस वृक्षकी जड़से लेकर शाखाग्रपर्यन्त रहता है, किंतु इस स्थितिमें उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता; वही जब अलग होकर फलके रूपमें आ जाता है, तब संसारमें सभीको प्रिय लगने लगता है॥ ६८॥✎ 1565
आमूलाग्रं रसस्तिष्ठन्नास्ते न स्वाद्यते यथा।
स भूयः संपृथग्भूतः फले विश्वमनोहरः॥ ६८
जिस प्रकार रस वृक्षकी जड़से लेकर शाखाग्रपर्यन्त रहता है, किंतु इस स्थितिमें उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता; वही जब अलग होकर फलके रूपमें आ जाता है, तब संसारमें सभीको प्रिय लगने लगता है॥ ६८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.68 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 46) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/2/68/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)