पूर्वकालमें जिस समय वेद-वेदान्तके पारगामी और गीताकी भी रचना करनेवाले भगवान् व्यासदेव खिन्न होकर अज्ञानसमुद्रमें गोते खा रहे थे, उस समय आपने ही उन्हें चार श्लोकोंमें इसका उपदेश किया था। उसे सुनते ही उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी॥ ७२-७३॥✎ 1565
यह अर्थ श्लोक 72–73 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
वेदान्तवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्तरि।
परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे॥ ७२
पूर्वकालमें जिस समय वेद-वेदान्तके पारगामी और गीताकी भी रचना करनेवाले भगवान् व्यासदेव खिन्न होकर अज्ञानसमुद्रमें गोते खा रहे थे, उस समय आपने ही उन्हें चार श्लोकोंमें इसका उपदेश किया था। उसे सुनते ही उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी॥ ७२-७३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.72 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 46) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/2/72/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)