श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.76

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भाग्योदयेन बहुजन्मसमर्जितेन

सत्सङ्गमं च लभते पुरुषो यदा वै।

अज्ञानहेतुकृतमोहमदान्धकार-

नाशं विधाय हि तदोदयते विवेकः॥ ७६

bhāgyodayena bahujanmasamarjitena

satsaṅgamaṃ ca labhate puruṣo yadā vai|

ajñānahetukṛtamohamadāndhakāra-

nāśaṃ vidhāya hi tadodayate vivekaḥ|| 76

अर्थ

जब अनेकों जन्मोंके संचित पुण्यपुंजका उदय होनेसे मनुष्यको सत्संग मिलता है, तब वह उसके अज्ञानजनित मोह और मदरूप अन्धकारका नाश करके विवेक उदय होता है॥ ७६॥✎ 1566

इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये कुमारनारदसंवादो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1566 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अज्ञान-जनित → अज्ञानजनित

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