सनकादि बोले—नारदजी! आप बड़े विनीत और विवेकी हैं। सुनिये, हम आपको ये सब बातें बताते हैं। हरिद्वारके पास आनन्द नामका एक घाट है॥ ४॥
शृणु नारद वक्ष्यामो विनम्राय विवेकिने।
गङ्गाद्वारसमीपे तु तटमानन्दनामकम्॥ ४
सनकादि बोले—नारदजी! आप बड़े विनीत और विवेकी हैं। सुनिये, हम आपको ये सब बातें बताते हैं। हरिद्वारके पास आनन्द नामका एक घाट है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.3.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 47) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/3/4/