श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.42

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

आजन्ममात्रमपि येन शठेन किञ्चि-

च्चित्तं विधाय शुकशास्त्रकथा न पीता।

चाण्डालवच्च खरवद्बत तेन नीतं

मिथ्या स्वजन्म जननीजनिदुःखभाजा॥ ४२

ājanmamātramapi yena śaṭhena kiñci-

ccittaṃ vidhāya śukaśāstrakathā na pītā|

cāṇḍālavacca kharavadbata tena nītaṃ

mithyā svajanma jananījaniduḥkhabhājā|| 42

अर्थ

जिस दुष्टने अपनी सारी आयुमें चित्तको एकाग्र करके श्रीमद्भागवतामृतका थोड़ा-सा भी रसास्वादन नहीं किया, उसने तो अपना सारा जन्म चाण्डाल और गधेके समान व्यर्थ ही गँवा दिया; वह तो अपनी माताको प्रसव-पीड़ा पहुँचानेके लिये ही उत्पन्‍न हुआ॥ ४२॥ जिसने इस शुकशास्त्रके थोड़े-से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्देके समान है। ‘पृथ्वीके भारस्वरूप उस पशुतुल्य मनुष्यको धिक्कार है’—यों स्वर्गलोकमें देवताओंमें प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं॥ ४३॥

यह व्याख्या श्लोक PRE.3.42 से PRE.3.43 तककी एक साथ है।

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