इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओंपर कृपा करके यहाँसे मत जाइये। भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तोंके लिये ही तो यह सगुण रूप धारण किया है॥ ५८॥✎ 12
अतः सत्सु दयां कृत्वा भक्तवत्सल मा व्रज।
भक्तार्थं सगुणो जातो निराकारोऽपि चिन्मयः॥ ५८
इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओंपर कृपा करके यहाँसे मत जाइये। भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तोंके लिये ही तो यह सगुण रूप धारण किया है॥ ५८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.3.58 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 52) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/3/58/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)