श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.74

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ब्रूमोऽद्य ते किमधिकं महिमानमेवं ब्रह्मात्मकस्य भुवि भागवताभिधस्य।

यत्संश्रयान्‍निगदिते लभते सुवक्ता श्रोतापि कृष्णसमतामलमन्यधर्मैः॥ ७४

brūmo'dya te kimadhikaṃ mahimānamevaṃ brahmātmakasya bhuvi bhāgavatābhidhasya|

yatsaṃśrayānnigadite labhate suvaktā śrotāpi kṛṣṇasamatāmalamanyadharmaiḥ|| 74

अर्थ

भूलोकमें यह भागवत साक्षात् परब्रह्मका विग्रह है, हम इसकी महिमा कहाँतक वर्णन करें। इसका आश्रय लेकर इसे सुनानेसे तो सुनने और सुनानेवाले दोनोंको ही भगवान् श्रीकृष्णकी समता प्राप्त हो जाती है। अतः इसे छोड़कर अन्य धर्मोंसे क्या प्रयोजन है॥ ७४॥

इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये भक्तिकष्टनिवर्तनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥

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