श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.14

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

कायेन वाचा मनसापि पातकं नित्यं प्रकुर्वन्ति शठा हठेन ये।

परस्वपुष्टा मलिना दुराशयाः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनन्ति ते॥ १४

kāyena vācā manasāpi pātakaṃ nityaṃ prakurvanti śaṭhā haṭhena ye|

parasvapuṣṭā malinā durāśayāḥ saptāhayajñena kalau punanti te|| 14

अर्थ

जो दुष्ट आग्रहपूर्वक सर्वदा मन, वाणी या शरीरसे पाप करते रहते हैं, दूसरेके धनसे ही पुष्ट होते हैं तथा मलिन मन और दुष्ट हृदयवाले हैं, वे भी कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते हैं॥ १४॥

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