॥ श्रीहरिः ॥
कथं रोदिषि विप्र त्वं का ते चिन्ता बलीयसी।
वद त्वं सत्वरं मह्यं स्वस्य दुःखस्य कारणम्॥ २६
kathaṃ rodiṣi vipra tvaṃ kā te cintā balīyasī|
vada tvaṃ satvaraṃ mahyaṃ svasya duḥkhasya kāraṇam|| 26
अर्थ
संन्यासीने पूछा—कहो, ब्राह्मणदेवता! रोते क्यों हो? ऐसी तुम्हें क्या भारी चिन्ता है? तुम जल्दी ही मुझे अपने दुःखका कारण बताओ॥ २६॥
कथं रोदिषि विप्र त्वं का ते चिन्ता बलीयसी।
वद त्वं सत्वरं मह्यं स्वस्य दुःखस्य कारणम्॥ २६
संन्यासीने पूछा—कहो, ब्राह्मणदेवता! रोते क्यों हो? ऐसी तुम्हें क्या भारी चिन्ता है? तुम जल्दी ही मुझे अपने दुःखका कारण बताओ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 56) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/26/