श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.38

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

पुत्रादिसुखहीनोऽयं संन्यासः शुष्क एव हि।

गृहस्थः सरसो लोके पुत्रपौत्रसमन्वितः॥ ३८

putrādisukhahīno'yaṃ saṃnyāsaḥ śuṣka eva hi|

gṛhasthaḥ saraso loke putrapautrasamanvitaḥ|| 38

अर्थ

जिसमें पुत्र-स्त्री आदिका सुख नहीं है, ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है। लोकमें सरस तो पुत्र-पौत्रादिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है॥ ३८॥

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