श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.44

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तरुणी कुटिला तस्य सख्यग्रे च रुरोद ह।

अहो चिन्ता ममोत्पन्‍ना फलं चाहं न भक्षये॥ ४४

taruṇī kuṭilā tasya sakhyagre ca ruroda ha|

aho cintā mamotpannā phalaṃ cāhaṃ na bhakṣaye|| 44

अर्थ

उसकी स्त्री तो कुटिल स्वभावकी थी ही, वह रो-रोकर अपनी एक सखीसे कहने लगी—‘सखी! मुझे तो बड़ी चिन्ता हो गयी, मैं तो यह फल नहीं खाऊँगी ॥ ४४॥

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