श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.57

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तया च कथितं भर्त्रे प्रसूतः सुखमर्भकः।

लोकस्य सुखमुत्पन्‍नमात्मदेवप्रजोदयात्॥ ५७

tayā ca kathitaṃ bhartre prasūtaḥ sukhamarbhakaḥ|

lokasya sukhamutpannamātmadevaprajodayāt|| 57

अर्थ

और उसने आत्मदेवको सूचना दे दी कि मेरे सुखपूर्वक बालक हो गया है। इस प्रकार आत्मदेवके पुत्र हुआ सुनकर सब लोगोंको बड़ा आनन्द हुआ॥ ५७॥

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