श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.68

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

चौरः सर्वजनद्वेषी परवेश्मप्रदीपकः।

लालनायार्भकान्धृत्वा सद्यः कूपे न्यपातयत्॥ ६८

cauraḥ sarvajanadveṣī paraveśmapradīpakaḥ|

lālanāyārbhakāndhṛtvā sadyaḥ kūpe nyapātayat|| 68

अर्थ

दूसरोंकी चोरी करना और सब लोगोंसे द्वेष बढ़ाना उसका स्वभाव बन गया था। छिपे-छिपे वह दूसरोंके घरोंमें आग लगा देता था। दूसरोंके बालकोंको खेलानेके लिये गोदमें लेता और उन्हें चट कुएँमें डाल देता॥ ६८॥

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