इसीसे अब प्रेतयोनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ। अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ॥ २९॥
अतः प्रेतत्वमापन्नो दुर्दशां च वहाम्यहम्।
वाताहारेण जीवामि दैवाधीनफलोदयात्॥ २९
इसीसे अब प्रेतयोनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ। अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.5.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 64) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/5/29/