na duḥkhaṃ na sukhaṃ tasya na vairī nāpi bāndhavaḥ|| 3
अर्थ
योगनिष्ठ गोकर्णजी तीर्थयात्राके लिये निकल गये। उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु॥ ३॥
गोकर्णस्तीर्थयात्रार्थं निर्गतो योगसंस्थितः।
न दुःखं न सुखं तस्य न वैरी नापि बान्धवः॥ ३
योगनिष्ठ गोकर्णजी तीर्थयात्राके लिये निकल गये। उन्हें इन घटनाओंसे कोई सुख या दुःख नहीं होता था; क्योंकि उनका न कोई मित्र था न शत्रु॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.5.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 62) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/5/3/