श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.40

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तुभ्यं नमो जगत्साक्षिन् ब्रूहि मे मुक्तिहेतुकम्।

तच्छ्रुत्वा दूरतः सूर्यः स्फुटमित्यभ्यभाषत॥ ४०

tubhyaṃ namo jagatsākṣin brūhi me muktihetukam|

tacchrutvā dūrataḥ sūryaḥ sphuṭamityabhyabhāṣata|| 40

अर्थ

उन्होंने स्तुति की—‘भगवन्! आप सारे संसारके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप मुझे कृपा करके धुन्धुकारीकी मुक्तिका साधन बताइये।’ गोकर्णकी यह प्रार्थना सुनकर सूर्यदेवने दूरसे ही स्पष्ट शब्दोंमें कहा—‘श्रीमद्भागवतसे मुक्ति हो सकती है, इसलिये तुम उसका सप्ताह पारायण करो।’ सूर्यका यह धर्ममय वचन वहाँ सभीने सुना॥ ४०-४१॥✎ 16

यह अर्थ श्लोक 40–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #16 शब्दोंके बीचका स्थान: करो,है → करो, है

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