॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.43
तत्र संश्रवणार्थाय देशग्रामाज्जना ययुः।
पङ्ग्वन्धवृद्धमन्दाश्च तेऽपि पापक्षयाय वै॥ ४३
tatra saṃśravaṇārthāya deśagrāmājjanā yayuḥ|
paṅgvandhavṛddhamandāśca te'pi pāpakṣayāya vai|| 43
अर्थ
देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये। बहुत-से लँगड़े-लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे ॥ ४३॥