॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.87
ब्रूमोऽत्र ते किं फलवृन्दमुज्ज्वलं सप्ताहयज्ञेन कथासु सञ्चितम्।
कर्णेन गोकर्णकथाक्षरो यैः पीतश्च ते गर्भगता न भूयः॥ ८७
brūmo'tra te kiṃ phalavṛndamujjvalaṃ saptāhayajñena kathāsu sañcitam|
karṇena gokarṇakathākṣaro yaiḥ pītaśca te garbhagatā na bhūyaḥ|| 87
अर्थ
नारदजी! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथाश्रवण करनेसे जैसा उज्ज्वल फल संचित होता है, उसके विषयमें हम आपसे क्या कहें? अजी! जिन्होंने अपने कर्णपुटसे गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षरका भी पान किया था, वे फिर माताके गर्भमें नहीं आये॥ ८७॥