॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.45
ब्रह्मचर्यमधःसुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम्।
brahmacaryamadhaḥsuptiḥ patrāvalyāṃ ca bhojanam|
kathāsamāptau bhuktiṃ ca kuryānnityaṃ kathāvratī|| 45
अर्थ
जो पुरुष नियमसे कथा सुने, उसे ब्रह्मचर्यसे रहना, भूमिपर सोना और नित्यप्रति कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें भोजन करना चाहिये॥ ४५॥