॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.47
कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च।
दम्भं मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती॥ ४७
kāmaṃ krodhaṃ madaṃ mānaṃ matsaraṃ lobhameva ca|
dambhaṃ mohaṃ tathā dveṣaṃ dūrayecca kathāvratī|| 47
अर्थ
काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दम्भ, मोह और द्वेषको तो अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिये॥ ४७॥