‘भगवन्! हमारी यह अभिलाषा है कि भविष्यमें भी जहाँ-कहीं सप्ताह-कथा हो, वहाँ आप इन पार्षदोंके सहित अवश्य पधारें। हमारा यह मनोरथ पूर्ण कर दीजिये’। भगवान् ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये॥ ८९॥
नगाहगाथासु च सर्वभक्तैरेभिस्त्वया भाव्यमिति प्रयत्नात्।
मनोरथोऽयं परिपूरणीयस्तथेति चोक्त्वान्तरधीयताच्युतः॥ ८९
‘भगवन्! हमारी यह अभिलाषा है कि भविष्यमें भी जहाँ-कहीं सप्ताह-कथा हो, वहाँ आप इन पार्षदोंके सहित अवश्य पधारें। हमारा यह मनोरथ पूर्ण कर दीजिये’। भगवान् ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये॥ ८९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.89 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 78) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/89/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)