॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.1.29
कदाचिद् द्वापरस्यान्ते रहोलीलाधिकारिणः।
समवेता यदात्र स्युर्यथेदानीं तदा हरिः॥ २९
kadācid dvāparasyānte raholīlādhikāriṇaḥ|
samavetā yadātra syuryathedānīṃ tadā hariḥ|| 29
अर्थ
कभी अट्ठाईसवें द्वापरके अन्तमें जब भगवान्की रहस्य-लीलाके अधिकारी भक्तजन यहाँ एकत्र होते हैं, जैसा कि इस समय भी कुछ काल पहले हुए थे, उस समय भगवान् अपने अन्तरंग प्रेमियोंके साथ अवतार लेते हैं। उनके अवतारका यह प्रयोजन होता है कि रहस्य-लीलाके अधिकारी भक्तजन भी अन्तरंग परिकरोंके साथ सम्मिलित होकर लीला-रसका आस्वादन कर सकें। इस प्रकार जब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं, उस समय भगवान्के अभिमत प्रेमी देवता और ऋषि आदि भी सब ओर अवतार लेते हैं॥ २९-३०॥