यहीं वह व्रजभूमि है, जिसमें भगवान्की वह वास्तवी रहस्य-लीला गुप्तरूपसे होती रहती है। वह कभी-कभी प्रेमपूर्ण हृदयवाले रसिक भक्तोंको सब ओर दीखने लगती है॥ २८॥
अत्रैव व्रजभूमिः सा यत्र तत्त्वं सुगोपितम्।
भासते प्रेमपूर्णानां कदाचिदपि सर्वतः॥ २८
यहीं वह व्रजभूमि है, जिसमें भगवान्की वह वास्तवी रहस्य-लीला गुप्तरूपसे होती रहती है। वह कभी-कभी प्रेमपूर्ण हृदयवाले रसिक भक्तोंको सब ओर दीखने लगती है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.1.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 986) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/1/28/