एक दिन भगवान् श्रीकृष्णकी विरह-वेदनासे व्याकुल सोलह हजार रानियाँ अपने प्रियतम पतिदेवकी चतुर्थ पटरानी कालिन्दी (यमुनाजी) को आनन्दित देखकर सरलभावसे उनसे पूछने लगीं। उनके मनमें सौतियाडाहका लेशमात्र भी नहीं था॥ ८॥
एकदा कृष्णपत्न्यस्तु श्रीकृष्णविरहातुराः।
कालिन्दीं मुदितां वीक्ष्य पप्रच्छुर्गतमत्सराः॥ ८
एक दिन भगवान् श्रीकृष्णकी विरह-वेदनासे व्याकुल सोलह हजार रानियाँ अपने प्रियतम पतिदेवकी चतुर्थ पटरानी कालिन्दी (यमुनाजी) को आनन्दित देखकर सरलभावसे उनसे पूछने लगीं। उनके मनमें सौतियाडाहका लेशमात्र भी नहीं था॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.2.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 989) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/2/8/