उनके प्रजाजनोंको भी बड़ा आनन्द था, वे सदा भगवान्के मधुर नाम तथा लीलाओंके कीर्तनमें संलग्न हो परमानन्दके समुद्रमें डूबे रहते थे और सदा ही वज्रनाभके राज्यकी प्रशंसा किया करते थे॥ ७॥
प्रजास्तु मुदितास्तस्य कृष्णकीर्तनतत्पराः।
परमानन्दसम्पन्ना राज्यं तस्यैव तुष्टुवुः॥ ७
उनके प्रजाजनोंको भी बड़ा आनन्द था, वे सदा भगवान्के मधुर नाम तथा लीलाओंके कीर्तनमें संलग्न हो परमानन्दके समुद्रमें डूबे रहते थे और सदा ही वज्रनाभके राज्यकी प्रशंसा किया करते थे॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.2.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 989) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/2/7/