जब भगवान् विष्णु स्वयं वक्ता होते हैं और लक्ष्मीजी प्रेमसे श्रवण करती हैं, उस समय प्रत्येक बार भागवतकथाका श्रवण एक मासमें ही समाप्त होता है॥ ३५॥
यदा विष्णुः स्वयं वक्ता लक्ष्मीश्च श्रवणे रता।
तदा भागवतश्रावो मासेनैव पुनः पुनः॥ ३५
जब भगवान् विष्णु स्वयं वक्ता होते हैं और लक्ष्मीजी प्रेमसे श्रवण करती हैं, उस समय प्रत्येक बार भागवतकथाका श्रवण एक मासमें ही समाप्त होता है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 997) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/3/35/