उस सन्देशको अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण कर गोपियाँ तुरन्त ही विरहवेदनासे मुक्त हो गयीं। मैं भागवतके इस रहस्यको तो नहीं समझ सका, किन्तु मैंने उसका चमत्कार प्रत्यक्ष देखा॥ ४७॥
तं यथामति लब्ध्वा ता आसन् विरहवर्जिताः।
नाज्ञासिषं रहस्यं तच्चमत्कारस्तु लोकितः॥ ४७
उस सन्देशको अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण कर गोपियाँ तुरन्त ही विरहवेदनासे मुक्त हो गयीं। मैं भागवतके इस रहस्यको तो नहीं समझ सका, किन्तु मैंने उसका चमत्कार प्रत्यक्ष देखा॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 999) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/3/47/