इसके बहुत समयके बाद जब ब्रह्मादि देवता आकर भगवान्से अपने परमधाममें पधारनेकी प्रार्थना करके चले गये, उस समय पीपलके वृक्षकी जड़के पास अपने सामने खड़े हुए मुझे भगवान्ने श्रीमद्भागवत-विषयक उस रहस्यका स्वयं ही उपदेश किया और मेरी बुद्धिमें उसका दृढ़ निश्चय करा दिया। उसीके प्रभावसे मैं बदरिकाश्रममें रहकर भी यहाँ व्रजकी लताओं और बेलोंमें निवास करता हूँ॥ ४८-४९॥✎ 909
यह अर्थ श्लोक 48–49 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
स्वर्वासं प्रार्थ्य कृष्णं च ब्रह्माद्येषु गतेषु मे।
श्रीमद्भागवते कृष्णस्तद्रहस्यं स्वयं ददौ॥ ४८
इसके बहुत समयके बाद जब ब्रह्मादि देवता आकर भगवान्से अपने परमधाममें पधारनेकी प्रार्थना करके चले गये, उस समय पीपलके वृक्षकी जड़के पास अपने सामने खड़े हुए मुझे भगवान्ने श्रीमद्भागवत-विषयक उस रहस्यका स्वयं ही उपदेश किया और मेरी बुद्धिमें उसका दृढ़ निश्चय करा दिया। उसीके प्रभावसे मैं बदरिकाश्रममें रहकर भी यहाँ व्रजकी लताओं और बेलोंमें निवास करता हूँ॥ ४८-४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 999) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/3/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)