श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.3.49

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

पुरतोऽश्‍वत्थमूलस्य चकार मयि तद् दृढम्।

तेनात्र व्रजवल्लीषु वसामि बदरीं गतः॥ ४९

purato'śvatthamūlasya cakāra mayi tad dṛḍham|

tenātra vrajavallīṣu vasāmi badarīṃ gataḥ|| 49

अर्थ

इसके बहुत समयके बाद जब ब्रह्मादि देवता आकर भगवान्‌से अपने परमधाममें पधारनेकी प्रार्थना करके चले गये, उस समय पीपलके वृक्षकी जड़के पास अपने सामने खड़े हुए मुझे भगवान्‌ने श्रीमद्भागवत-विषयक उस रहस्यका स्वयं ही उपदेश किया और मेरी बुद्धिमें उसका दृढ़ निश्‍चय करा दिया। उसीके प्रभावसे मैं बदरिकाश्रममें रहकर भी यहाँ व्रजकी लताओं और बेलोंमें निवास करता हूँ॥ ४८-४९॥✎ 909

यह अर्थ श्लोक 48–49 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #909 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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